ठूला-ठूला रुखहरू हेर्दा
मजा आउंछ.
साना-साना फूलको बोटहरूमा
सानो चारोले,मीठो बोलेको सुन्दा
मजा आउंछ.
सिमसिमे पानी परिरहेको बेला
हरियालीलाई झ्यालबाट हेर्दा मजा आउंछ.
फेवातालमा डुंगा चलाउँदै
हिमाल हेर्दा मजा आउंछ.
राम्रो कुक्कुरलाई
दौडी-दौडी,उफ्री-उफ्री खेलेको देख्दा मजा आउंछ.
भैंसीहरूलाई,गैंडाहरूलाई
हीलोमा बसेको देख्दा मजा आउंछ.
तर मानिषहरूलाई देख्दा
मन दिग्दार हुन्छ.
मानिषहरूको निराश,गम्भीर मुख देख्दा
सबैलाई उठायेर
समुद्रमा फाली दिउँ जस्तो लाग्छ
माछाहरूको पेट पनि भर्ने थियो,
उनीहरूलाईपनि मजा आउँथ्यो,
र पृथ्वीको छाती बाट
उदासीको भारि
हलुका हुन्थो.
Wednesday, March 23, 2011
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सर यति निर्दयी त हुनुभएन नि! ती उदासलाई बरु हँसाउने हो कि:)
ReplyDeleteसर्वोत्तम कविता।
ReplyDeleteयाद नहीं कि कविता पढ़कर इससे अधिक आनंद इससे पहले कभी आया हो।
वाह! वाह! वाह! शानदार! बेमिसाल! दुःखी मन को आनंद से भर देने वाली कविता।
बसंत जी,
ReplyDeleteयह निर्ममता नहीं है। आदमी को हंसाने का प्रयास, दुःख दूर करने का प्रयास तो बहुतों ने किया। ईशा से ओशो तक । मगर हासिल क्या हुआ ? वही दर्द! वही दुःखों का पहाड़!
कवि कभी किसी को उठा के समुंद्र में फेंक नहीं सकता। चींटी भी मारना नहीं चाहता। मनुष्यों को क्यों कर फेंकेगा भला ! मगर यह कवि का दर्द है। विरक्ति है। एक टीस है उसके भीतर कि वह लाख चाहने के बाद भी किसी के दर्द को कम नहीं कर पा रहा। वह अन्य जीवों से मनुष्यों की तुलना करता है तो उसे सबसे दुःखी मनुष्य ही दिखाई पड़ते हैं। हाय रे मानव ! तू सबसे बुद्धिमान प्राणी और तू ही उदासी का भार लिये घूम रहा है! धिक है तेरा जीवन ! इससे अच्छा तो तुझे उठाकर समुंन्द्र में क्यों न फेंक दिया जाय!
ऐसा कहकर कवि मानव को सचेत भी करता है और सोचने के लिए विवश भी। यह कविता जितने हल्के-फुल्के ढंग से अपनी बात कहती है इसकी व्याख्या की जाय तो अनंत भाव हैं इसमें।
शेष तो सर जी खुद ही कहेंगे।
देवेन्द्र्जी,आपने प्रशंशा कुछ अधिक-ही किया है.वैसे,बसंतजी के लिये आपने बिलकुल ठीक लिखा,धन्यवाद.
ReplyDeleteयह निर्ममता नहीं है। आदमी को हंसाने का प्रयास, दुःख दूर करने का प्रयास तो बहुतों ने किया। ईशा से ओशो तक । मगर हासिल क्या हुआ ? वही दर्द! वही दुःखों का पहाड़!
ReplyDeleteachha likha hai
http://shayaridays.blogspot.com